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कोरोना के इलाज के खर्च ने लोगों के सिर पर बढ़ाया कर्ज का बोझ

अनिल शर्मा उन लोगों में शामिल हैं जिनका 24 वर्षीय बेटा कोरोना संक्रमित होने के बाद बेहद खराब हालत में अस्‍पताल में भर्ती कराया गया था। प्राइवेट अस्‍पताल में उनका बेटा करीब दो माह से भी अधिक माह तक भर्ती रहा। मई में जिस वक्‍त कोरोना की वजह से पूरे देश में हाहाकार मचा हुआ था उस वक्‍त अनिल के बेटे सौरव को वेंटिलेटर पर रखा गया था। सौरव में मुंह में लगी एक नली के दम पर सब कुछ चल रहा था। अनिल उस वक्‍त को अब तक नहीं भूल सके हैं। उन्‍होंने बताया कि वो बहुत मजबूती के साथ अपने बेटे के पास मौजूद थे। लेकिन सौरव के वेंटिलेटर पर जाने के बाद अनिल खुद को नहीं संभाल सके और आंखों में आंसू लिए उस कमरे से बाहर निकल गए।सौरव अब अपने घर में है, लेकिन उसकी हालत अब भी पूरी तरह से ठीक नहीं है। बीमारी के बाद सौरव काफी कमजोर हो चुका है। इस वजह से अनिल की सौरव के घर वापस आने की खुशी काफूर बनी हुई है। ऐसा होने की केवल एक ही वजह नहीं है बल्कि इसकी एक बड़ी वजह लगातार बढ़ते मेडिकल के खर्च है। अनिल के लिए इस कर्ज के पहाड़ को पाटना मुश्किल हो गया है। भारत में भले ही अब कोरोना के मामले कम हो चुके हैं लेकिन अनिल समेत लाखों लोगों के लिए मेडिकल बिल का खर्च परेशानी का सबब बना हुआ है। भारत में अधिकतर लोगों के पास हेल्‍थ इंश्‍योरेंस नहीं है। यही वजह है कि कोविड-19 महामारी का खर्च लोगों के लिए परेशानी का कारण बन गया।अनिल शर्मा ने एंबुलेंस, टेस्टिंग, दवाओं और आईसीयू के बिल को चुकाने के लिए अपनी बचत का इस्‍तेमाल किया था।

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