Spiritual/धर्म

हनुमानजी के बिना प्रभु श्रीराम का दरबार कदापि पूर्ण नहीं होता

 विगत अंकों में हमने पढ़ा कि श्री हनुमान जी जीव और ब्रह्म के मिलन को प्रतिक्षण तत्पर हैं और सुग्रीव श्री हनुमान जी पर उनके सामर्थ्य व विवेक पर पूर्ण विश्वास करते हैं। सज्जनों रामायण के अंदर वर्णित यह भिन्न−भिन्न प्रसंग जो हम पढ़ते अथवा सुनते हैं ऐसा नहीं कि ये एक कहानी अथवा उपन्यास के कोई अंश हैं। इन प्रसंगों में घटने वाली निम्न से भी निम्न दिखने वाली कोई घटना सीधे हमारे लिए अध्यात्मिक ऊँचाइयों का श्रेष्ठतम संदेश समेटे होती है। अब यहाँ ही आप देख लीजिए श्री हनुमान जी जब श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता करवाते हैं तो अग्नि को साक्षी बनाकर मित्रता करवाते हैं−

तब हनुमंत उभय दिसि की सब कथा सुनाइ।

पावक साखी देइ करि जोरी प्रीति दृढाइ।।

अर्थात् श्री हनुमान जी ने दोनों ओर की सब कथा सुनाकर अग्नि को साक्षी देकर परस्पर दृढ़ करके प्रभु श्रीराम एवं सुग्रीव की प्रीति जोड़ दी। सज्जनों आप चिंतन दृष्टि से अगर देखेंगे तो हनुमान जी ने श्रीराम जी और सुग्रीव का मैत्री संबंध बिल्कुल वैसे ही जोड़ा जैसे सांसारिक तौर पर कोई पंडित दूल्हा−दुल्हन को अग्नि साक्षी करवाकर उनका पति−पत्नी का संबंध जोड़ता है। तो क्या श्री हनुमान जी ने श्रीराम और सुग्रीव को दूल्हा−दुल्हन के प्रपेक्ष्य में लिया? निःसंदेह इसका उत्तर हाँ में है। सांसारिक दृष्टिकोण से भले ही हमें यह हास्यसपद लगे लेकिन आध्यात्मिक दृष्टिकोण इसे पूर्णतः उचित व न्यायसंगत मानता है। वह यूं कि धर्मिक ग्रंथों में सभी जीव आत्माओं को नारी रूप में ही देखा गया है। और पुरुष केवल ईश्वर को ही गया गया है।

इसु जम महि पुरखु एकु है होर सगली नारि सबाई।।

और जब कोई संत मिलते हैं तो आत्मा और परमात्मा का मिलन करवाते हैं। यहाँ हनुमान जी संत की भूमिका में हैं और श्रीराम−सुग्रीव की भूमिका जीव और ब्रह्म की है। अग्नि को साक्षी बनाकर प्रीति दृढ़ करने की जो बात गोस्वामी जी ने लिखी वह अपने गर्भ में गूढ़ रहस्य संजोए हुए है। वह यह कि प्रीति तो संसार में किसी न किसी से हो ही जाती है। लेकिन आवश्यक नहीं कि वह प्रीति दृढ़ ही हो। कारण कि जरा-सा स्वार्थ सिद्ध नहीं हुआ तो प्रीति टूट जाती है। लेकिन श्री हनुमान जी का मत तो यही है कि देखो भई सांसारिक प्रीति या संबंध बनाने में और उन्हें आगे सुदृढ़ अथवा विकसित करने हेतु हमारा अवतार ही नहीं हुआ। जीव और ब्रह्म की प्रीति कैसे सुदृढ़ हो हमारा सारा चिंतन, प्रयास व बल इसी के निमित है। अब श्रीराम और सुग्रीव की मैत्री की शुरुआत तो हमने करवा दी लेकिन बीच में यह जलती हुई अग्नि को साक्षी बना दिया। इसके पीछे कुछेक कारण हैं। प्रथम तो यह कि मित्रता के साक्षी के रूप में उसी को रखना चाहिए जो पूर्णतः पावन व पवित्र हो। जो केवल धर्म का पक्ष ले। जैसे अग्नि का धर्म जलाना होता है। अब उसमें पापी तथा पुण्यात्मा जो भी हाथ डालेगा वह उसे समान रूप से जला डालेगी। अग्नि कोई पक्षपात नहीं करती। उसके अंदर न किसी के लिए राग है और न ही द्वेष। संदेश है कि अगर मित्रों में साक्षी ऐसा हो जो पूर्णतः निष्पक्ष हो तो आपकी मित्रता सर्वोत्तम है, श्रेष्ठ है। इसके अंदर आध्यात्मिक संदेश यह है कि सुग्रीव जीव है और श्रीराम जी ब्रह्म। दोनों के मिलन पर साधना, त्याग, तपस्या की अग्नि निरंतर प्रज्ज्वलित रहती है। तो जीव ब्रह्म से प्रीति व संबंध निरंतर प्रगाढ़ करता रहता है। योग व समाध की राहि पर नित नई ऊँचाइयों को प्राप्त होता है। श्रीराम−सुग्रीव और अग्नि तो ठीक है लेकिन साथ में श्री हनुमान जी की निरंतर उपस्थिति का क्या तात्पर्य है? वह यह कि भले ही गुरु अथवा संत ने जीव एवं ब्रह्म के बीच एक बार मित्रता की नींव रख दी हो और बीच में साधना की अग्नि भी अनवरत जल रही हो लेकिन तब भी श्री हनुमान जी जैसे गुरु अथवा संत की सदैव, प्रतिक्षण साथ रखना परम आवश्यक है। क्योंकि अभी तो मित्रता का सिर्फ आरंभ ही हुआ है, प्रगाढ़ नहीं हुई। हो सकता है कि दोनों मित्रों में कल को कोई ऐसी घटना भी घट जाये जो दोनों मित्रों के परस्पर प्रेम को समाप्त ही कर दे। तो ऐसी स्थिति में कौन इस संबंध की रक्षा करेगा? कौन दिशा दिखायेगा? तो ऐसे में श्री हनुमान जी जैसे संत ही होते हैं जो विकट परिस्थिति में भी सब कुछ संभाल लेते हैं। और सुग्रीव के प्रसंग में हम आगे देखते भी हैं कि कैसे राज्य प्राप्त करने के पश्चात सुग्रीव अपनी सेवा−कर्त्तव्य को भूल ही जाता है। और सुग्रीव को पुनः मार्ग पर लाने हेतु जब श्रीराम जी श्री लक्ष्मण को भेजते हैं तो श्री हनुमान जी ही थे जो सुग्रीव को समझाकर सारी बिगड़ती परिस्थितियां संभाल लेते हैं। और सुग्रीव पुनः श्रीराम जी की सेवा में उपस्थित व तत्पर हो उठता है।सांसारिक विवाह साधना के इसी क्रम की तो झांकी है। पंडित संत की भूमिका निभाता है। पति परमात्मा की और पत्नी जीव की भूमिका निभाती है। और बीच में अग्नि सांकेतिक रूप है। त्याग, तपस्या व पावनता का। अर्थात् पति−पत्नी के मध्य अगर त्याग, तपस्या व पावनता का संस्कार विद्यमान है और सदैव किसी साधु का सान्निध्य है तो मानना कि यह बैकुण्ठ की जीती जागती झांकी है।

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